





एक दिन श्री दुर्गा प्रसाद त्रिवेदी बाबाजी के पास एक पुस्तक " कबीर संगीत रत्नमाल " अपने साथ ले गये। दुर्गा प्रसाद जी ने बाबाजी से कहा कि कबीर अच्छे महात्मा हुए थे, उनके पद्य बड़े अच्छे है, आज्ञा हो तो कुछ पद्य सुनाऊँ।
बाबाजी ने गम्भीरतापूर्वक हँसते हुए कहा कबीर महात्मा नहीं भक्त थे और उन्होंने किसी पद्य की रचना नही की। उनके ही समय में या पीछे उनके सत्संगी लोगो ने उनके द्वारा सुने हुए उपदेशो को पद्य रुप में लिख दिया है।
प्रसंग अच्छा ही चल गया और बाबा जी ने थोड़ी ही देर में श्री कबीरदास, दादू दयाल, नानक, चरणदास आदि सन्तो का इतिहास इनकी योग्यता, क्षमता व पन्थ निर्माण रचना विचार आदि के बारे में सुना दिया। यह सुनने से दुर्गा प्रसाद जी के हृदय का अन्धकार एकाएक दूर हो गया और उन्हे एक विशेष प्रकार का आनन्द अनुभव होने लगा।
बाबाजी ने दया भरे नेत्रो से दुर्गा प्रसाद जी की ओर देखकर मन्द हास्य से कहा "यदि तुम्हारी इच्छा हो तो तुम भी पद्य रचना कर सकते हो, विचार करते ही तुम्हारे मस्तिष्क में यह शक्ति उत्पन्न हो जायेगी"। सरलता और कृपा से अनायास ही यह वरदान पाकर उनके हृदय में एक विशेष प्रकार का आनन्द और उत्साह उत्पन्न हो गया और शीघ्रातिशीघ्र इस वरदान का अनुभव करने की इच्छा से उनका मन चंचल हो गया। सांयकाल होने पर वे अपने निवास स्थान पर आये और पद्य रचना करने बैठ गये।
सत गुरु नौका पार उतारो।
भवसागर का थाह नहीं है मन के खेवट मतवारो।
हूँ अनाथ कोई नाथ नहीं साथी केवल तव आधारो॥
पंच भ्रमर मन में अति भारी, रोकत गैल हमारो।
अति विकराल रुप है सब विधि मच्छ एक मतवारो॥
पंच मीन अति दीन जान मोहि, देत त्रास अति भारी।
काँपत काया डरपत है मन, स्वामी दया विचारो॥
"अमृतनाथ दया के सागर" मेरे दुःख निवारो।
दुर्गा शंकर, तव शरणागत भव से शीघ्र उबारो॥
बड़ी सरलता से उन्होंने 20 मिनट में 9 पंक्तियों का एक सुन्दर पद्य लिख डाला जिससे उनको आश्चर्य और प्रगाढ़ आनन्द हुआ। पद्य रचना में उनका मन लगने लगा और शंकर नाम से उन्होंने शिव, शक्ति आदि की उपासनामय पद्यों की रचना की। आगे जा कर उनका मन योग, भक्ति, वैराग्य, प्रार्थना, निर्गुण भाव आदि की पद्य रचना में लगने लगा। इनकी ये पद्य रचनाएँ " श्री विलक्षण अवधूत परमहंस श्री अमृतनाथ जी महाराज" नामक पुस्तक में प्रकाशित हुई।
इसी पुस्तक से कुछ पद्यो को यहाँ दोहा के रुप में प्रस्तुत किया गया हैः-
| 1. | विनया चोबीशा |
| 2. | भक्ति महिमा |
| 3. | दया महिमा |
| 4. | क्षमा महिमा |
| 5. | सन्तोष महिमा |
| 6. | धैर्य महिमा |
| 7. | सत्संग महिमा |
| 8. | योगी की महिमा |
| 9. | ब्रह्म ज्ञान |
| 10. | विषय विकार |
| 11. | अन्य उपदेश |